भुलाया ना गया

“अरे! तू वापस कब आया? दूर से पहचाना ही नहीं जा रहा था। कितने सालों बाद देख रही हूँ तूझे। काफी दुबला हो गया है पहले से। कैसा है तू?”

अचानक से आई हुई बातों की बौछार से संभलते हुए उसने कहा –
“हाँ। थोड़ा सा वज़न घटाया है। और वैसे सब ठीक ही है। मुझे लौटे लगभग दो साल हो चुके। तुम कैसी हो?” 

“मैं बिल्कुल ठीक हूँ। बहुत अर्से बाद तुझे देखकर अच्छा…”

बातों को बीच में टोकता हुआ, एक धीमी सी पुकार सुनाई दी। कुछ दूर से किसी ने आवाज़ लगाई –
“कंचन, अभिनव को संभालो ज़रा। मम्मी नहीं दिख रही इसलिए परेशान हो कर हर तरफ ढूंढ रहा था तुम्हें।”

थोड़े नज़दीक आने पर कहा –
“यह लो, गिफ्ट पैक करवा लिया है। ज़रा ध्यान से रख लो अपने बैग में।”

गिफ्ट बैग में रखते हुए कंचन मुस्कुराई –
“ओ! पहचान करवा देती हूँ। यह मेरे पति, शशांक और यह मेरा दोस्त…”

फिर से अपनी बात खत्म ना कर पाई कंचन। बस डेढ़ साल का नन्हा अभिनव अपनी माँ का दुपट्टा खींचने लगा –
“मम्मी, तलो ला। निकिल केक का लेगा।”

“मेरे बेटे के दोस्त का जन्मदिन है। पड़ोसी हैं हमारे। वहीं जा रहे अभी। तू आना कभी हमारे घर। अब भी हर बात पे मज़ाक करता है क्या?”

कंचन ने जवाब का इन्तज़ार नहीं किया। अलविदा कहते हुए अपने बेटे का हाथ थामा और लिफ्ट की ओर चली गई। शशांक ने मुस्कुराते हुए हाथ मिलाया –
“थोड़ी जल्दी है हमें, इसलिए आप से ठीक से परिचय ना हो पाया। वक्त मिले तो हमारे घर ज़रूर आईए। बातचीत भी होगी और कंचन को भी अच्छा लगेगा।”

इन कुछ पलों में वह खुद ज़्यादा बोल ना पाया। विस्मित हो कर थोड़ी देर खड़ा रहा अपनी जगह पर।
फिर हल्की सी मुस्कान चेहरे पर लिए अपने घर की ओर चल पड़ा, अभिनव शर्मा।

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