नन्हें जीवन

नन्हे दो पैरों के बल पर,
चले होकर वें सवार
जिधर जी गया भागे उधर ही,
ना माने भीड़, ना कतार।

कभी जो गिर पड़े ज़मीन पर,
मुँह अपना सकुचातें हैं
बिन आँसू के थोड़ा रोते,
वापस घर वें आते हैं।

घर हैं उनका बहुत विशाल
छत है, ना दरवाज़े हैं;
खिड़कियाँ ना हो चाहे, पर
चिड़ियों की आवाज़ें हैं।

तीन भाई और एक बहन हैं
बड़े की उमर है लगभग सात,
छोटी बहन बस दूध है पीती
अभी तक नहीं करती बात।

पता नहीं उन बच्चो क्यों,
माँ को पागल कहते सब।
उनपर वह बड़ी चिल्लाती,
मार लगाती थी जब तब।

एक पहर को खाना मिले तो
नवाब समझते अपनों को,
मच्छर जब सोने नहीं देते,
जाग के देखते सपनों को।

भूखे, दुबले पर दिल से खुश
नादानी की मूरत हैं।
धुप में जलते, बारिश भिगोती
फिर भी हसमुख सूरत हैं।

जन्म से ही फिर इनको क्यों
लाचारियाँ मिलते हैं;
याद आया फिर कीचड़ में ही,
कमल के फूल खिलते हैं।

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