शाम हो चुकी थी। आज भी दफ्तर से निकलने में देर करवा दिया कम्बख्त अफसरों ने। किसी भी तरह दराज़ो को बंध कर के अतुल घर की ओर चल पड़ा। पहले से ऑटो बुला रखा था उसने, बाहर आते ही उस में सवार हो गया।
आज अतुल की शादी की दसवीं सालगिरह है। दस साल पहले ऐसे ही एक सर्द की शाम को घर से भाग के उसने अपने बचपन की सबसे नज़दीकी दोस्त नुसरत को हमेशा के लिए अपना बनाया था। पहले एक मंदिर में जाकर हिन्दू नियमानुसार शादी की थी, और फिर एक मौलवी के घर जा के इस्लाम धर्म के मुताबिक निकाह किया था। घरवालों ने कभी माना नहीं इस रिश्ते को, पर जब मियां बीवी राज़ी, तो क्या करे क़ाज़ी।
तीन साल काफी मेहनत की और तकलीफे सही थी दोनों ने। कभी कभी दिनभर एक दुसरे की सूरत देखना भी नसीब नहीं होता था। फिर धीरे धीरे हालातें बदली, घर में धन और खुशियां साथ आयी। शादी के छह साल बाद अतुल और नुसरत को संतान का सुख भी प्राप्त हुआ। नन्ही मुस्कान के दुनिया में आने से दोनों को जीने की नई वजह मिली।
अचानक राह चलते किसी गाड़ी की आवाज़ से अतुल को होश आया। ऑटो वाला मुस्कुराते हुए बोला –
“सर, आप काफी थके हुए लग रहे। आखें लग गयी थी आपकी। मैंने देखा नहीं होता तो सीट से गिर जाते। चाय पीनी है?”
अतुल ने गर्दन हिला के मना कर दिया –
“शुक्रिया भैया, पर अभी वक़्त नहीं है। अगर कोई गुलदस्ते की दुकान नज़र आए, तो दो मिनट के लिए ऑटो रोकना।”
ऑटो फिर से चलने लगी। थोड़ी दूर एक फूलों का दुकान मिला। वहाँ से अतुल ने एक अच्छा सा गुलाब का गुलदस्ता लिया और वापस ऑटो में बैठ गया। अतुल ने घड़ी पर नज़र डाली तो देखा लगभग सात बज चुके थे। मन में सोचा –
“नुसरत इंतज़ार कर रही होगी काफी देर से। मुस्कान को भी तैयार करना पड़ेगा घर जा के।”
इसी बीच ऑटो अतुल के घर के सामने आ रुकी। ऑटो का किराया देकर अतुल घर के अंदर आया और फिर मुस्कान को देखकर चौक गया। उसकी बेटी थी तो बस चार साल की, पर मम्मी इंतज़ार कर रही होगी यह सोचकर खुद से तैयार हो के बैठी थी पापा के लिए। अतुल को देखते ही डांटकर बोली –
“पापा फिर से देर कर दी आपने। अब जल्दी चलो।”
अतुल ने ज़्यादा वक़्त बर्बाद नहीं किया और कुछ ही देर में बाप-बेटी घर से निकल पड़े।
अतुल अपने कॉलेज के दिनों से अपनी गायिकी के लिए मशहूर था। उसने नुसरत और अपने बेटी को कुछ गाने सुनाए। मुस्कान ने स्कूल जाना शुरू किया था, उसने वहाँ से सीखे कुछ अंग्रेजी कविताए सुनाई। नुसरत ने खामोश रहकर पति और बेटी की प्रतिभा का आनंद लिया। इसी तरह करीबन दो घंटे बीत गए। सर्दियों का मौसम था और ठण्ड बढ़ने लगी थी। अतुल ने मुस्कान से पूछा –
“अब घर चले? मम्मी को भी आराम करना है।”
मुस्कान उठ गयी और पापा का हाथ पकड़ लिया। अतुल ने गुलदस्ते को पत्थर पर संभाल कर रखा और फिर नुसरत को अलविदा कहते हुए, बेटी का हाथ थामे, कब्रिस्तान से घर की ओर चल दिया।
