जीवन अप्रत्याशित

“अब और आँखें खुली रखी नहीं जाती। मिनट भर बाद पानी बहने लगता है। बात करने की कोशिश करो तो जबड़े दर्द करते है। सुबह नर्स ने सेलाइन की बोतल चढ़ाई थी, पर यह तरल पदार्थ अंदर जा भी नहीं रहा। माँ को देखने का बड़ा मन कर रहा है। पता नहीं कौन उनका ध्यान रख रहा होगा अभी। खैर, थोड़ी देर सो ही लेता हूँ। वैसे भी और क्या ही काम है करने को।”


शाम के चार बजने वाले थे। अगले कुछ ही मिनटों में मुंबई से अगली ट्रेन आने वाली थी। करीम पुणे स्टेशन के बाहर अपनी गाड़ी में बैठा हुया था। वरुण सर घर लौट रहे थे करीब एक साल बाद और कंपनी ने उसे भेजा था उन्हे स्टेशन से उनके घर तक ले जाने के लिए। करीम वरुण सर को अच्छी तरह से पहचानता था। तीन साल से उन्हे कभी भी गाड़ी की ज़रूरत होती थी तो वह करीम को याद करते थे। चाहे वो ऑफिस का मामला हो या अपने निजी काम के लिए। वरुण सर की माँ को बस गाड़ी से सफर करने की अनुमति थी, इसलिए उनके परिवार को जहां भी जाना हो, उन्हें करीम का सहारा लेना पड़ता था। और इसी बदौलत, करीम राजस्थान, गोवा, केरल जैसे जगह घूम चुका था। वरना खुद की तनख्वाह तो उसके अपने छोटे मोटे खर्चें से ही खत्म हो जाता है।

कुछ बीस मिनट बाद ट्रेन स्टेशन में आ पहुँचा। भीड़ निकल गई तो करीम को वरुण सर नज़र आए। अपना सामान संभालते हुए वह प्लेटफॉर्म से बाहर आ रहे थे। करीम ने जा के उनके हाथ से सामान लिया और गाड़ी में रख दी। वरुण सर चुपचाप गाड़ी में बैठ गए और गाड़ी चल पड़ी। करीम ने शीशे से पीछे बैठे सर को देखा तो उनका चेहरा उतरा हुआ था।

“आप कुछ ठीक नहीं लग रहे सर। ए. सी. बंद कर दूँ? खिड़कियां खोल देता हूँ।”

वरुण सर ने कुछ कहा नहीं, बस सिर हिला कर मन कर दिया। थोड़ी देर में उनका घर आया तो वह तब भी कुछ ना बोले। इशारे से शुक्रिया कहते हुए अंदर चले गए। करीम ने नौकर को सामान थमाया और गाड़ी लेकर चला गया। वरुण सर बात करना बहुत पसंद करते है। पर उन्हे आज बिल्कुल चुप देखकर करीम को अजीब लगा।

अगले दिन ऑफिस जा कर करीम को पता लगा की वरुण सर बीमार है। विदेश गए हुए थे तो आखिरी के कुछ दिनों में उनके शरीर में बुखार आता जाता रहता था। करीम को याद आया, वह गाड़ी में बैठे खास और छींक भी रहे थे। उस दिन रात को घर लौटते वक़्त उसने वरुण सर के घर के बाहर बैठे गार्ड से उनका हाल पूछा तो पता चला की उनको अस्पताल में दाखिल करवाया गया था। करीम ने गार्ड से कहा की अगर घरवालों को कोई जरूरत हो तो उसे बताए, वह गाड़ी लेकर आ जाएगा।

दो हफ्ते निकल गए। करीम अपनी माँ को लेकर अपने गाँव सोलापूर गया हुआ था। एक दिन करीम अपने पाँच साल के भांजे के साथ आंगन में खेल रहा था जब अचानक उसकी साँसे फूलने लगी। पास रखे कुर्सी पर बैठ के वह अपने छाती पर हाथ फेरने लगा। मामा को अचानक बैठते देख भांजे ने अपनी माँ को आवाज़ लगाई। घरवाले सब बाहर आए तो करीम ज़मीन पर बैठे खास रहा था। उसकी माँ ने करीम के सर पर हाथ रखा तो शरीर बुखार से तप रही थी। कुछ ही पल में ऐसा क्या हुआ किसी को समझ नहीं आया। करीम के चाचा ने गाँव के हकीम को घर बुलवाया।


एक घंटे बाद जब हकीम पहुँचा, तब तक करीम का बुखार थोड़ा उतर चुका था पर खासी और सांस लेने में तकलीफ तब भी हो रही थी। हकीम ने अच्छे से जांच की और फिर करीम को आराम करने की सलाह दी। कुछ दवा लिख दिए ताकि खासी ठीक हो जाए और दुबारा बुखार ना आए। अगले दो दिन करीम ने ज़्यादातर वक़्त सो के गुज़ारे। खासी कम ज़रूर हुई पर बुखार का आना जाना बना रहा। चौथे दिन फिर से करीम को बुखार चढ़ा और अब दवाई भी असर नहीं कर रहा था। हकीम को फिर से बुलवाया गया। हकीम ने करीम की नस जांची तो उसे काफी धीमा पाया। हकीम ने घरवालों से कहा की वे करीम को अस्पताल में दाखिल करवा दे।

गाँव से थोड़ी दूर सरकारी अस्पताल में करीम को दाखिल करवाया गया। अस्पताल के सारे सीनियर डॉक्टर शहर गए हुए थे किसी नए रोग के बारे में जानकारी लेने। तीन जूनियर डॉक्टर पर मरीज़ों का दायित्व था और साथ में करीब पंद्रह नर्स और अन्य कर्मचारी। अस्पताल में दो दिन रहने के बाद भी करीम की हालत में कोई सुधार नहीं आई। ज़्यादातर वक़्त वह बेहोश रहता था। और होश आए तो खासी बढ़ जाती थी।


तीसरे दिन शहर से एक डॉक्टर वापस आए तो उनको करीम की हालत के बारे में बताया गया। डॉक्टर ने करीम को देखा तो उनको उस में वही लक्षण दिखाई दिए जिनकी जानकारी के लिए वह शहर गए हुए थे। उन्होंने करीम को एक अलग कमरे में स्थानांतरित किया और उस कमरे में एक जूनियर डॉक्टर, दो नर्स और एक सफ़ाई वाले के अलावा बाकी सब को जाने से मन कर दिया। घरवालों को बस कमरे के बाहर से करीम को देखने की अनुमति मिली।

कुछ दिन और निकले पर करीम अब भी अधिकतर वक़्त बेहोशी में गुज़ार रहा था। डॉक्टर ने करीम की हालत देखकर उसके घरवालों से उसे शहर ले जाने को कहा। करीम के चाचा को डॉक्टर ने उसकी स्थिति के बारे में समझने की कोशिश की पर कुछ ज़्यादा फायदा नहीं हुआ। घरवालों से मशवरा करने के बाद डॉक्टर करीम को लेकर अस्पताल के एम्बुलेंस में पुणे रवाना हुए।


वहाँ पहुंचते ही करीम को आई. सी. यू. में ले जाया गया। पूरे एक दिन उसके हर किस्म की परीक्षा की गई। पर कोई सफल परिणाम डॉक्टरों के हाथ नहीं लगा। करीम को अब दिन में बस कुछ ही घंटों के लिए होश रहता था और अगर उस वक़्त भी उसे तकलीफ महसूस हो तो उसे नींद की दवा दे दी जाती थी। नींद में अक्सर करीम अपनी माँ और भांजे का नाम लेता था।

इसी बीच डॉक्टरों को आखिरकार करीम के खून में उस रोग के विषाणु मिले जिस पर अभी उनका जांच चल रहा था। डॉक्टरों ने तुरंत करीम के घरवालों को इसकी सूचना दी और उन्हें बताया की अब करीम तभी घर जा सकता है जब वह फिर से पूरी तरह स्वस्थ हो जाए। उन्होंने घरवालों को थोड़े बहुत पैसों का भी इंतज़ाम करने को कहा गया।


करीम ने एक पर्ची पर अपने ऑफिस का और वरुण सर के घर का फोन नंबर लिखकर अपने माँ को दे रखा था। बूढ़ी सलमा ने अपने बेटे के दफ्तर में फोन लगाया तो उन्होंने उसकी बात सुने बगैर ही फोन रख दिया। करीम के चाचा ने फिर से कोशिश की तो दफ्तर वालों ने कहा की वे ड्राइवर को बस पगार देते है। उनके दवाई और अस्पताल के खर्चे का कोई अलग पैसा नहीं मिलेगा। अब वरुण सर के घर फोन लगाया गया। पर कई बार कोशिश करने पर भी वहाँ से किसी का जवाब नहीं मिला। चौथी या पाँचवीं बार कोशिश की गई तो किसी ने फोन उठा के बस रख दिया ताकि फिर से कोई नंबर न मिला सके। करीम की माँ अब बिल्कुल टूट गई।

कुछ और दिन गुज़र गए और अब करीम की साँसे बहुत धीमी हो गई थी और होश आना लगभग बंध हो गया। पैसों का जुगाड़ ना होने के कारण करीम को ज़मीन पर एक रजाई पर रखा गया था। करीम में अब भी कहीं थोड़ी जान बची थी जो आधी खुली पलकों के पीछे से कभी कभी झलकती थी। मुंह से खाना बंध हो चुका था और बस सेलाइन की बोतलें चढ़ाई जा रही थी। गौर से उसकी तरफ कोई देखे तो लगता था जैसे कुछ बोलना चाहता हो।


करीम काफी देर से सोया हुआ था और सेलाइन की बोतल से तरल उसके शरीर में जा नहीं रही थी। ड्यूटी पर लगे नर्स ने सेलाइन की बोतल को ज़रा सा टटोला और फिर चली गई। एक घंटे बाद जब लौटी तो बोतल के अंदर भरे तरल की मात्रा में कोई बदलाव नहीं था। उसने करीम की तरफ देखा और डॉक्टर को आवाज़ लगाई। दुनिया भर में अचानक से फैलने वाली इस रोग से पीड़ित बस दो ही लोग मिले थे अब तक पुणे में। और जिस वक़्त डॉक्टर पहले मरीज़ को स्वस्थ घोषित कर के घर जाने की अनुमति दे रहे थे, तभी दूसरे मरीज़ ने अपना दम तोड़ दिया। उस दूसरे मरीज़ को और उसके घरवालों को पता भी नहीं चला की आखिर हुआ क्या था और कैसे हुआ था। शायद पैसों का जुगाड़ हो जाता तो वह बच जाता। पर अब सवालों का क्या मतलब जब जवाब ने खुद जवाब दे दिया हो।

अगले दिन दोनों मरीज़ साथ अस्पताल से निकले। करीम के जनाज़े को एक छोटे से ट्रक में चढ़ाया गया। और उनके बगल से एक काली गाड़ी उस पहले मरीज़ को लेकर वहाँ से चली गई। गाड़ी के पिछले शीशे पर नाम लिखा था, वरुण कुमार वर्मा।

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